प्राचीन भारत में वैज्ञानिक दृष्टि

विज्ञान की विस्मयकारी प्रगति विश्व-भर के कर्मठ वैज्ञानिकों के सामूहिक प्रयास का प्रतिफल है। यह सर्वविदित है कि विज्ञान की दृष्टि से प्राचीन भारत की उपलब्धियां विस्मयकारी थीं। परन्तु ऐसा देखा गया है कि वर्तमान में जब भी प्राचीन भारतीय विज्ञान की चर्चा होती है, तो भारतीय जनमानस दो गुटों में विभाजित हो जाते हैं। एक गुट के अनुसार हमारे पूर्वजों ने प्राचीन काल में ही सबकुछ खोज लिया था, तो दूसरे गुट के अनुसार प्राचीन भारतीय वांड्मय में कुछ भी वैज्ञानिक नहीं है। पहले गुट के अनुसार यदि प्राचीन ग्रन्थों की भलीभांति व्याख्या की जाए, तो आधुनिक विज्ञान के सभी आविष्कार उसमें पाए जा सकते हैं।
जब प्राचीन काल के विज्ञान पर गहन चर्चा की जाती है तो भारतीय जनमानस अपने दावे की पुष्टि के लिए प्राचीन ग्रंथों (वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत आदि) के उपलब्धियों के उदाहरण प्रस्तुत किये जाते हैं, जैसे- राडार प्रणाली (रूपार्कण रहस्य), गौमूत्र को सोने में बदलने की तकनीक, मिसाइल तकनीक, कृष्ण विवर का सिद्धांत, सापेक्षता सिद्धांत एवं क्वांटम सिद्धांत, विमानों की भरमार, संजय द्वारा दूरस्थ स्थान पर घटित घटनाओं को देखने की तकनीक, समय विस्तारण सिद्धांत, अनिश्चितता का सिद्धांत, संजीवनी औषधि, कई सिर वाले लोग, भांति-भांति प्रकार के यंत्रोंपकरण आदि-इत्यादि।
एक आम हिन्दुस्तानी अपने पूर्वजों के उच्च कोटि के प्रौद्योगिकी पर बेहद गर्व करता है। उसे ये उपलब्धियां अपने गौरवपूर्ण स्वर्णिम इतिहास की झलक दिखाती प्रतीत होती हैं और वह यह मानता है कि जरुर हमारे पूर्वज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की दृष्टि से उन्नत रहे होंगे। वहीं दूसरे गुट के लोग प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों को बेतुका, छल-कपटपूर्ण और अप्रासंगिक मानते हैं।
तो हम किसे सही मानें, पहले गुट को या दूसरे गुट को? जैसाकि हम जानते हैं कि विज्ञान सूचनाओं एवं तथ्यों पर आधारित ज्ञान है। विज्ञान में किसी भी सिद्धांत को स्वीकार करने से पहले प्रमाण की विश्वसनीयता की कठिन परीक्षा ली जाती है। इसमें सूचनाओं एवं तथ्यों का तार्किक एवं क्रमबद्ध विश्लेषण अनिवार्य है। यह शर्त पहले गुट की कपोल-कल्पनाओं पर लागू नहीं होती है। वहीं दूसरे गुट के लोगों में वैज्ञानिक कट्टरता झलकती है।
बिना प्रमाण, परीक्षण के किसी भी बात को मान लेना अवैज्ञानिक है, उसी प्रकार से प्रमाण, परीक्षण को नकार देना भी अवैज्ञानिक है। इसलिए हम इस लेख में पूर्वाग्रहों को दूर करते हुए प्राचीन साहित्य में जो कुछ वैज्ञानिक है, उसे निष्पक्ष भाव से उजागर करने का प्रयास करेंगे। पहले हम उन दावों का विश्लेषण करेंगे जिससे यहपता चलता है कि हमारे पूर्वज वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न थे। उसके बाद हम उन दावों का विश्लेषण करेंगे जिसके अनुसार आधुनिक विज्ञान की सभी खोजों को हमारे पूर्वजों ने खोज लिया था।
वेदों में विज्ञान (Science in Vedas)
वर्तमान अनुसंधानों से ऐसे प्रमाण मिले है, जिससे यह प्रतीत होता है कि सिंधु घाटी सभ्यता मिश्र तथा बेबीलोन की सभ्यता से अधिक विस्मयकारी और महान थी। सिन्धुघाटी की सभ्यता के लोग कच्ची-पक्की इंटों और लकड़ी के अच्छे भवनों में रहते थे, जो योजना के अनुसार बने हुए थे। वहां की नालियाँ ग्रीड पद्धति के अनुसार बनी थीं। पुरातत्ववेत्ताओं को मोहनजोदड़ो से एक विशाल स्नानागार मिला है। सिन्धुघाटी सभ्यता के स्थानों से अनेक प्रकार के बांटभी मिले हैं, जिनमें आश्चर्यजनक रूप से एकरूपता है। यहाँ की लिपि को अभी तक नहीं पढ़ा जा सका है। विद्वानोंका अनुमान है कि सिंधु सभ्यता के लोगों को रेखागणित और अंक-गणित का अच्छा ज्ञान रहा होगा।
हमारे देश की आम जनता को वेदों के बारे में बड़ी गलतफहमी है। बहुसंख्य जनता यह मानती है कि वेद विज्ञान के अक्षय भंडार है, परंतु हमें याद रखना चाहिए कि वेद लगभग साढ़े तीन हजार साल पहले की कृतियाँ हैं। इनमें उतना ही विज्ञान है जितना की तत्कालीन मानव समाज ने खोजा था। वैदिक साहित्य के चार प्रमुख अंगों – वेद (ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद), ब्राह्मण-ग्रंथ, उपनिषद तथा वेदांग से हमें वैदिक-कालीन समाज की वैज्ञानिक उपलब्धियों की जानकारी प्राप्त होती है। (अगले पृष्ठ पर जारी)
वैदिक काल की कोई भी लिपि नहीं थी, इसलिए वेदों को श्रुति कहा गया है। प्राचीन भारत में इन्हें रट-रटकर मौखिक रूप से प्रसारित करने की परम्परा थी। वैदिक ऋषियों को सूर्य, चन्द्र, ग्रहों एवं तारों की गतिविधियों का अच्छा ज्ञान था। परन्तु सूर्य, चन्द्र, ग्रहों और तारों की दूरियों के संबंध में बिलकुल भी ज्ञान नहीं था। ऋग्वेद में 12 महीनों का चन्द्रवर्ष माना गया है। वैदिक ऋषियों को सात ग्रहों, 27 नक्षत्रों, खगोलीय परिघटना उत्तरायण-दक्षिणायन का ज्ञान था। वैदिक ऋषियों को ग्रहणों की बारंबारता का ज्ञान था, परन्तु ग्रहणों के कारणों की जानकारी नहीं था।
ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा संचालन जिन नियमों से होते हैं, ऋग्वेद में उसे ऋत् की संज्ञा दी गयी है। ऋग्वेद का नासदीय सूक्त वैदिक ऋषियों के ब्रह्मांड की उत्पत्ति से सम्बन्धित तर्कसंगत चिंतन का परिचय देता है। एक वैदिक ऋषि कहता है कि ‘प्रलयकाल में पंच-महाभूत सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और न ही असत् का अस्तित्व था। उस समय भूलोक, अंतरिक्ष तथा अन्तरिक्ष से परे अन्य लोक नहीं थे। सबको आच्छादित करने वाले (ब्रह्मांड) भी नहीं थे। किसका स्थान कहाँ था? अगाध और गम्भीर जल का भी अस्तित्व कहाँ था?’ अन्यत्र ऋग्वेद का एक ऋषि कहता है कि ‘ब्रहमांड की उत्पत्ति का कारण कोई भी नहीं जानता, भगवान भी नहीं क्योंकि वह भी बाद में पैदा हुआ है’।
वैदिक ज्योतिष का सार महर्षि लगध के वेदांग ज्योतिष_Vedang jyotish को माना जाता है। यह भारत की पहली ज्ञात ज्योतिष की पुस्तक है। वेदांग ज्योतिष में काल गणना तथा पंचांगों के संबंध में विस्तृत वर्णन मिलता है।
वैदिककालीन चिकित्सा के बारे में हमें सर्वाधिक जानकारी अथर्ववेद से प्राप्त होती है। इसमें सिरदर्द, यक्ष्मा(टीबी), बुखार आदि बिमारियों का उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद में हमें जड़ी-बूटियों से इलाज के साथ-साथ जादू-टोने, झाड़-फूंकआदि के बारे में भी जानकारी मिलती है। दरअसल, उस समय के वैद्य या ओझा यह मानते थे कि राक्षस, भूत और पिशाच मनुष्यों में असाध्य रोग फैलाते हैं। सभ्यता के इस आदि काल में रोगों को पाप-कर्म, पूजा-अर्चना में कमी का फल माना गया है।
विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन: शून्ययुक्त दाशमिक अंक पद्धति
महान वैज्ञानिक बंट्रेंड रसेल_Bantered russell से जब यह पूछा गया कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत की सबसे महत्वपूर्ण देन क्या है, तो उन्होंने द्वयर्थक शब्द का प्रयोग करते हुए उत्तर दिया ‘जीरो’ यानी शून्य। वस्तुतः शून्य प्राचीन भारतीय गणित की सबसे महत्वपूर्ण देन है। शून्य के ही माध्यम से दाशमिक स्थानमान अंक पद्धति निकली। शून्ययुक्त यह अंक पद्धति भारत की विश्व को सबसे बड़ी बौद्धिक देन है। आज सम्पूर्ण विश्व में इसी अंक पद्धति का उपयोग होता है। यह अंक पद्धति अरबों के माध्यम से यूरोप पहुंचकर ‘अरबी अंक पद्धति_Arabic numeral system’ बन गयी और अंततः ‘अन्तर्राष्ट्रीय अंक पद्धति_International numeral system’ बन गयी। भारतीय संविधान में इस अंक पद्धति को ‘भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय अंक पद्धति’ कहा गया है।
वैदिक काल में न तो शून्य की धारणा ने जन्म लिया था और न ही दाशमिक अंक पद्धति ने। पांचवी-छठी सदी के गणितज्ञ-ज्योतिषी आर्यभट और ब्रह्मगुप्त इस अंक पद्धति से परिचित थे। कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि शून्ययुक्त दाशमिक स्थानमान अंक पद्धति प्राचीन भारत का सबसे बड़ा मौलिक आविष्कार है।

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